मेरे बारे में

मैं मंजिल पर पहुँचा हुआ पथिक नहीं हूँ | मंजिल की ओर सरकता साधारण कवि हूँ |कलाकार हूँ | मंजिल मिलेगी भी या नहीं |कुछ भी नहीं पता |चल रहा हूँ ……..बस चला जा रहा हूँ | लगभग 5 दशक पूर्व म. प्र. के मंडला जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले के सुदूर ग्रामीण अंचल का जंगलों से घिरा वह गाँव, साधारण किसान परिवार में जन्म हुआ| तब वहां के 25-30 खपरैल मकानो में कोई 100 से 150 की आबादी रही होगी| धर्मान्धता , रूढ़िवाद , कुप्रथाओं एवं अन्धविश्वास के शिकंजे में कसा- फँसा तब का वह मेरा गाँव, आज भी अपने बद्तर हालातों से मुक्ति के लिए झटपटा रहा है| और पढ़ें!