नाम- श्याम बैरागी
पिता का नाम- स्व. श्री इमरतदास जी
माता का नाम- श्रीमती सरस्वती देवी
जन्म- 25 जून सन 1970
जन्म स्थान- बहेरी (कान्हा रोड इंद्री ) राष्ट्रीय वन उद्द्यान कान्हा किसली के पास जिला मंडला (म.प्र.)
शिक्षा- बी काम, डी|एड
व्यवसाय- अध्यापन
नमस्कार

मैं मंजिल पर पहुँचा हुआ पथिक नहीं हूँ | मंजिल की ओर सरकता साधारण कवि हूँ |कलाकार हूँ | मंजिल मिलेगी भी या नहीं |कुछ भी नहीं पता |चल रहा हूँ ……..बस चला जा रहा हूँ |

लगभग 5 दशक पूर्व म. प्र. के मंडला जैसे आदिवासी बाहुल्य जिले के सुदूर ग्रामीण अंचल का जंगलों से घिरा वह गाँव, साधारण किसान परिवार में जन्म हुआ| तब वहां के 25-30 खपरैल मकानो में कोई 100 से 150 की आबादी रही होगी| धर्मान्धता , रूढ़िवाद , कुप्रथाओं एवं अन्धविश्वास के शिकंजे में कसा- फँसा तब का वह मेरा गाँव, आज भी अपने बद्तर हालातों से मुक्ति के लिए झटपटा रहा है|

मुझे अच्छे से याद नहीं है कि किस ‘अमुक ’ घटना ने मुझे लिखने के लिए मजबूर किया | शायद वह कोई वाक्या रहा होगा, जिसने मेरे अचेतन को चोटिल किया हो |

हाँ मुझे यह अच्छे से याद है की सामाजिक विषमताओं और आर्थिक असमानताओं ने दिल और दिमाग में खलबली मचा दी | इन्ही बुराइयों से लड़ने के लिए मैंने गीत , गजल , कविता एवं व्यग्यों को हथियार बना लिया |

मैं कल रहूँ या न रहूँ , मेरी लड़ाई रहेगी | वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना और समता मूलक समाज का निर्माण मेरा अंतिम लक्ष्य है , जिसे पूरा किये बिना मुझे चैन कहाँ , करार कहाँ !

शासकीय योजनाओं पर गीत लिखना मेरा कर्त्तव्य है |प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष रूप से शासकीय योजनाओं से लोगों का जीवन प्रभावित होता है , शासकीय सेवक होने के नाते नहीं , बल्कि देश के एक सजग नागरिक होने के नाते मैं चाहता हूँ कि शासन की मंशा के अनुरूप योजनायें वास्तविक पात्रों तक पहुंचे और वे लाभान्वित हों |उद्देश्य , लक्ष्य और सपनों को साकार करने की दिशा में मैंने अब तक 16 ऑडियो सी डी के लिए गीत लिखे हैं तथा साथियों के साथ स्वर दिए हैं|मुझे बेहद ख़ुशी होती है जब लोग मुझसे कहते हैं की आपके गीत से प्रभावित होकर मेने ‘फला’ योजना का लाभ लिया |

30 साल की अपनी साहित्यिक और संगीत यात्रा के दौरान तीन पुस्तके क्रमशः ‘चिंगारी’ , ‘दुर्दशा’ तथा ‘जंगल माने जिंदगी’ का प्रकाशन एवं 16 ऑडियो के लिए गीत, कविता लेखन , सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन और कुछ पत्रिकाओं का सम्पादन मेरे संघर्ष के पदचिन्ह हैं |

और अंत में कोई हजारों गजलें , सैकड़ों गीत अब भी किसी के होंठों पर आने के लिए मचल रहे हैं | ये वो फूल हैं जो खिल गए हैं ,इससे भी ज्यादा सुन्दर ,ख़ूबसूरत और कीमती वो फूल हैं, जो कली बनने की प्रक्रिया से पूर्व की अवस्था में हैं | मैं बस इतना कहकर रुकना चाहूँगा की बस ‘इंतज़ार करें’……